रात…धीरे-धीरे बीत रही थी…एक तरफ…कबीर अपनी बेटी के पास बैठा था…और दूसरी तरफ…करण अपने बेटे को सीने से लगाए ...
संयोगिता बाथरूम से बाहर आई। उसने अपने बालों को ठीक किया था और चेहरे पर पानी के छींटे मारकर ...
रात गहरी थी। खिड़की से आती चांदनी बिस्तर पर हल्की-सी चांदी बिखेर रही थी। शैलजा करवट लेकर सोई हुई ...
( सुबह का वक्त। हल्की धूप खिड़की से छनकर कमरे में गिर रही है। हवा में सन्नाटा है। सिया ...
कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था…अंदर…श्रेया बिस्तर के कोने में बैठी…घुटनों में चेहरा छिपाएबिलख-बिलख कर रो रही थी…उसकी सिसकियाँ…दिल ...
अंधकार लोक का विशाल द्वार अब रितांश के सामने था। उसकी लाल आँखें क्रोध की अग्नि में जल रही ...
विराट ने कांपते हुए हाथों से संयोगिता के पैर पकड़ लिए। उसकी आँखों से आंसू बह रहे थे, जो ...
(सुबह का समय। खिड़की से हल्की धूप कमरे में फैल रही है। पर कमरे में शांति नहीं, एक बेचैनी ...
रात अब और भी गहरी हो चुकी थी। अंधेरा इतना सघन था कि मानो वह रितांश के चारों ओर ...
वो पल…चारों के लिए जैसे समय को रोक देने वाला था…शिवांश…करण से लिपटा हुआ था…और शिवांशी…कबीर की उंगली पकड़कर ...